Monday, 7 August 2017

  सवारी 

हम रोज़ की सवारी हैं,
कभी काम से, कभी ऐंवई..... 

हम कहीं न कहीं आते जाते रहते है,
रस्ते पे आधी उम्र गुज़ारते है!
दुनिया भर का धुआं अंदर लेते है, 
और चू भी नहीं करते..... 

किसी सरकार को हमारा ध्यान नहीं,
इनके हिसाब से भेड़ बकरी है हम!
पर हमारे घूमने को फ़ुज़ूल नहीं बोलिये,
हम रोज़गार बढ़ाते हैं!

ओला, ऑटो, रिक्शा, बस, मेट्रो, सब हुमी पर ज़िंदा है,
हमसे तो ऑटो या रिक्शा वाले कुछ नहीं पूछते 
बस चल देते है। 
यही इज़्ज़त है हमारी,

क्योंकि हम है रोज़ की सवारी!

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